इजरायल: जहां है घर-घर फौजी

इजरायल: जहां है घर-घर फौजी

इजरायल मिसाल है स्वाभिमान की, आत्मसम्मान की और आत्मविश्वास की! चारों तरफ दुश्मन देशों से घिरे होने और न के बराबर प्राकृतिक संसाधन के बावजूद इस देश ने अपनी अलग पहचान कायम की है। इजरायल की खूबियों-खामियों से रूबरू करा रहे हैं, हाल में वहां का दौरा कर लौटे सतीश मिश्र:

यहां महिलाएं भी सेना में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दुश्मन से लड़ती हैं। बेहद खूबसूरत दिखने वालीं ये महिला सैनिक इतनी मजबूत हैं कि सन 2000 में नियम बदलकर महिलाओं और पुरुषों की यूनिटें आपस में मिला दी गईं। हम बात कर रहे हैं इजरायल की, जो दुनिया के उन मुट्ठी भर देशों में से है, जहां महिलाओं के लिए भी सैन्य सेवा अनिवार्य है। यहां कुल सैनिकों में एक-तिहाई और अधिकारी लेवल पर करीब आधी महिलाएं हैं। महिला सैनिकों को भी पुरुषों के बराबर कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है। उन्हें भी हर तरह के हथियार चलाने और किसी भी हालात से निपटने के लिए इतना मजबूत बनाया जाता है कि वे हर मौके पर खुद को साबित कर सकें। शायद आपको ऐसी महिला ब्रिगेड दुनिया में कहीं देखने को न मिले क्योंकि ये जितनी खूबसूरत दिखती हैं, उतनी ही बहादुर और मजबूत भी हैं। यहां अनिवार्य सैन्य सेवा से शादीशुदा महिलाओं, मांओं और इस्राइली-अरब महिलाओं को छूट है। वैसे, कड़ी जिंदगी के बावजूद यहां अक्सर महिला सैनिकों के यौन उत्पीड़न की शिकायतें सामने आती हैं। आंकड़े बताते हैं कि सेना में काम करने वाली 20% महिलाएं यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं।

इजरायल सरकार की मुख्य प्रवक्ता शैली एशकोली के मुताबिक पहले महिला सैनिकों को हमेशा फ्रंट से दूर बैक ऑफिस के काम पर लगाया जाता था लेकिन 1967 में अरब-इस्राइल युद्ध में एक महिला अफसर ने इस नियम को तोड़ा और वह जॉर्डन के मोर्चे पर चली गईं। वहां उन्होंने जिस तरह जोश के साथ पुरुष साथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लोहा लिया, उसका जिक्र आज तक किया जाता है। हालांकि उन्होंने चूंकि सेना के नियमों की अनदेखी की थी इसलिए उन्हें चार हफ्ते की सजा भुगतनी पड़ी। आधिकारिक रूप से 2006 में दूसरे लेबनान युद्ध के दौरान महिलाओं ने पहली बार लड़ाई में हिस्सा लिया।

अनिवार्य सैन्य सेवा के फायदे
 

 

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चूटियो को छूट मिली तो भज्जा समजके खगाय जी ए संपदक भी चुटिया हैंन भई जिस देश मे रहेता उसकी तारीफ करना सिखले

Javed Shaikh

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इजरायल में 18 साल से ज्यादा उम्र के नागरिकों (इजरायल के अरब नागरिकों को छोड़कर) को अनिवार्य रूप से सैन्य सेवा करनी पड़ती है। सिर्फ धार्मिक सेवारत, विकलांग या मनोरोगियों को इससे छूट है। पुरुषों के लिए सामान्यत: यह अवधि दो साल आठ महीने की और महिलाओं के लिए दो साल की होती है। इजरायल सरकार की प्रवक्ता शैली एशकोली ने साफ किया, 'प्रशिक्षण हासिल करनेवाले हर शख्स को सेना की जरूरत के मुताबिक सेवा देने के लिए तैयार रहना होता है। ओलिंपिक खेलों के प्रतिभाशाली खिलाड़ियों, डांसरों और संगीतकारों को अपनी प्रतिभा विकसित करने के लिए सेवा अवधि में 75% तक की छूट मिलती है।' हालांकि एक सच यह भी है कि हाल के बरसों में अनिवार्य सेवा से छूट मांगनेवालों का प्रतिशत लगातार बढ़ता जा रहा है। ज्यादातर रईस अपने बच्चों को 18 साल का होने से पहले दूसरे देशो में पढ़ने भेज देते हैं। कई बार लोग लाइलाज बीमारी या विकलांगता का फर्जी सर्टिफिकेट देकर खुद को अनिवार्य सैन्य भर्ती से बचा लेते हैं। कई तो इससे बचने के लिए दूसरे देश में जाकर बस जाते हैं।

वैसे सिर्फ सैन्य सेवा ही क्यों, इजरायल और भी कई चीजों में अनोखा है। सिर्फ 87 लाख जनसंख्या वाले इस देश के साथ ईश्वर ने इंसाफ नहीं किया। देश का 75% हिस्सा रेगिस्तान में है लेकिन यहां एक गैलन तेल नहीं निकलता जबकि सटी हुई सीमा के सभी देश मसलन सऊदी अरब, जॉर्डन, मिस्र, सीरिया में तेल के लबालब भंडार हैं। राजनीतिक तौर पर संपूर्ण अस्थिरता वाला ऐसा देश है यह जिसमें किसी दल को आज तक बहुमत नहीं मिला लेकिन जब बात देशहित, राष्ट्रीय सुरक्षा, सम्मान और स्वाभिमान की होती है, सभी की आवाज हमेशा एक रही है। आज प्रधानमंत्री नेतनियाहू और उनकी पत्नी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों में जांच विरोधियों की मांग पर हो रही है लेकिन जैसे ही अरब मुद्दे की बात होगी, इन सब की एक आवाज होगी। यही होता है देश का सच्चा चरित्र।

एक देश, एक भाषा
14 मई 1948 को इस्राइल बना था। तब दुनिया के कोने-कोने से आकर यहूदी यहां बसे। वे अपने साथ अलग-अलग जीवन-शैलियां और भाषाएं लेकर आए लेकिन कोई एक संपर्क भाषा न होने के कारण इनके बीच बहुत बड़ी खाईं थी। ऐसे में इनकी मूल भाषा हिब्रू को फिर से जिंदा करने का फैसला लिया गया लेकिन बहुत कम लोग ही हिब्रू जानते थे। सरकार ने हिब्रू सिखाने के लिए एक नायाब पंचवर्षीय भाषा अभियान चलाया। इसके तहत पूरे देश में जो भी शख्स हिब्रू जानता था, वह दिन में 11 बजे से 1 बजे तक अपने इलाके के स्कूल में जाकर हिब्रू पढ़ाता था। स्कूल में यह भाषा सीखनेवाले बच्चे रोजाना शाम को अपने माता-पिता और बाकी उम्रदराज लोगों को हिब्रू पढ़ाते थे। सरकार ने अगस्त 1948 से अगले पांच साल तक रोजाना हिब्रू की मूल और शुरुआती शिक्षा का ज्ञान रेडियो से प्रसारित करना शुरू किया। पांच साल खत्म होने तक पूरा देश हिब्रू सीख चुका था। आज तो यहां इंजीनियरिंग और मेडिकल से लेकर सारी उच्च शिक्षा भी हिब्रू में होती है। इस देश में अपनी जड़ को जीवित रखने का ऐसा जज्बा दिखाकर एक मिसाल पेश की हो, उसे कौन पछाड़ सकता है?

पढ़ाई और सेहत पर जोर
इजरायल की शिक्षा प्रणाली अनूठी है। चूंकि 18 साल का होने के बाद सभी को इजरायल सैन्य सेवा में शामिल होना अनिवार्य है इसलिए सारे पाठ्यक्रम इस तरह बनाए गए हैं कि पढ़ाई पूरी करते ही स्टूडेंट्स मिलिटरी में शामिल हो सकें। यहां 18 साल की उम्र तक पढ़ाई मुफ्त है। इजरायल की 8 यूनिवर्सिटियों में मेडिकल और विज्ञान की पढ़ाई पर खासा जोर है। प्राथमिक विद्यालय में किताबी पढ़ाई के साथ-साथ संगीत, कला, फैशन डिजाइनिंग और फिजिकल एजुकेशन की स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है। इजरायल में इस बात पर ज्यादा जोर रहता है कि छात्रों के रुझान को विकसित कर उसे लोकतंत्र, पर्यावरण संरक्षण, हिब्रू भाषा और शांति के मूल्यों में दक्ष बनाया जाए। इसी तरह, यहां की चिकित्सा प्रणाली काफी उन्नत है। यहां के असुटा अस्पताल में जब हमने कुछ चीजें जानने की कोशिश की तो डॉक्टर से लेकर बाकी सभी इस बात से चिंतित दिखे कि इन जानकारियों का कहां और किस तरह इस्तेमाल किया जाएगा। यह भी पता चला कि वे सभी एक ऐसे प्रोटीन की खोज के अंतिम चरण में हैं, जो जेनेटिक वजहों से होनेवाले मांसपेशियों के दर्द के जोखिम को लगभग खत्म कर देगा। असुटा अस्पताल की अधिकारी दीना ओरेनबाच के मुताबिक, 'इजरायल कभी भी दुनिया में अपनी रिसर्च का ढिंढोरा नहीं पीटता। वैसे दुनिया बिना कहे इस सच को जानती है कि हमारे देश में सर्जरी और इलाज बहुत बेहतर है। हम जानकारियों और रिसर्च का आपस में लेन-देन भी करते हैं जिससे दुनिया में हर किसी को इसका फायदा मिल सके।'

शतरंज है खासा पॉप्युलर
इजरायल में सबसे लोकप्रिय खेल फुटबॉल और बास्केटबॉल हैं। शतरंज भी यहां खासा पॉप्युलर है। विंड सर्फिंग के राष्ट्रीय खिलाड़ी इडो कात्ज कहते हैं कि हमें पूरा ध्यान शतरंज के विकास पर लगाना चाहिए क्योंकि हम इसमें हमेशा से अव्वल रहे हैं। मैं देश की खेल प्रतिभा विकास कार्यक्रम से जुड़ा रहा हूं और मानता हूं कि अगर बहुमुखी प्रयास करने के बदले शतरंज पर सबसे ज्यादा फोकस किया जाए तो इजरायल इसका बादशाह बन सकता है। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा खेल आयोजन मकाबी (इजरायल) में होता है, जो दुनिया भर के सिर्फ यहूदियों के लिए होता है। 2005 में वर्ल्ड टीम चेस चैंपियनशिप की मेजबानी भी इस्राइल कर चुका है। 1992 में पहली जीत के बाद से अब तक इजरायल ने कुल 9 ओलिंपिक पदक जीते हैं।

रेगिस्तान में लहलहाती खेती का अजूबा
कृषि जगत में क्रांति का उदाहरण है इजरायल। देश का ज्यादातर हिस्सा रेगिस्तान में होने और न के बराबर बारिश होने के बावजूद ‘ड्रिप इरिगेशन’ तकनीक के सहारे इजरायल रोजाना हजारों टन फूल और सब्जियां यूरोप को भेज रहा है। सिर्फ ठंडे माहौल (करीब 9 डिग्री) और समुद्र तल से दूर उगनेवाले अंगूर को रेगिस्तान के भीतर और वह 45 डिग्री तापमान में उगाकर आज वह वाइन का बड़ा निर्यातक देश बन गया है।

1. इस्राइल की सड़कों पर भारतीय सैनिक?
यरुशलम के टॉवर ऑफ डेविड्स के सामने अरब मार्केट की ओर जानेवाले रास्ते पर एक साथ परेड में कदमताल करते भारतीय सैनिकों को देखकर एकबारगी तो अचंभा हुआ कि आखिर इतने सैनिक यहां क्या कर रहे हैं? उनके साथ चलते हुए काफी जानकारी ली। इत्तफाक यह हुआ कि देश लौटते हुए विमान में भी वे मिल गए। पता चला कि वे सैनिक नहीं, 2015 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अफसर थे जो इजरायल में एंटी-टेररिस्ट ट्रेनिंग लेने आए थे।

2. मोदी की घोषणा से नया विवाद
हाल में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन दिवसीय यात्रा पर इजरायल गए थे। वहां उन्होंने एक ऐसी घोषणा कर डाली है जिसे लेकर रक्षा विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है। मोदी ने घोषणा की कि इजरायल में भारतीय मूल के उन लोगों को भी प्रवासी नागरिक (ओसीआई) का कार्ड मिलेगा, जिन्होंने इजरायल की सेना में अनिवार्य सैन्य सेवा दी हो। यह दुनिया के किसी भी देश में नहीं हुआ। बताते हैं कि इसे लेकर सेना के उच्चाधिकारी चिंतित हैं क्योंकि दोहरी नागरिकता वाला सैन्य शिक्षा में दक्ष शख्स जाने-अनजाने में कई संवेदनशील क्षेत्रों में जा सकता है या ऐसे दस्तावेज हासिल कर सकता है, जो देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं।

क्या कहते हैं जानकार
मामूली-सी बारिश के पानी को भी जमा कर ड्रिप इरिगेशन के जरिए उगाई गए अंगूर की नस्ल अब जल्द ही इजरायल वाइन को विश्व स्तर पर ले जा रही है। रेगिस्तान में उपलब्ध सौर ऊर्जा का भी बेहतरीन इस्तेमाल इजरायल ने किया है। 
-इत्साक येजबर्ग, कई किस्मों के फल पैदा करनेवाले किसान

हम अपने छात्रों को इतना सक्षम बना देना चाहते हैं कि सारी दुनिया उनकी तरफ एक आदर्श के रूप में देखे। मेडिकल के क्षेत्र में हमारे यहां कई ऐसी रिसर्च हो रही हैं, जो दुनिया को पूरी तरह से बदल देने की क्षमता रखती हैं। हमारी यूनिवर्सिटियों में भारत समेत कई देशों के स्टूडेंट पढ़ाई कर रहे हैं।
-इमा कोवजाई, तेल अवीव यूनिवर्सिटी की प्रवक्ता

 

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