क्या रुपए की कीमत करना भारतीय अर्थव्यवस्था के हित में है

भारतीय मुद्रा (रुपया) में लगातार होती गिरावट के बाद बुधवार को एक अमरीकी डॉलर के मुक़ाबले भारतीय रुपया 72.88 के स्तर पर पहुंच गया है.

अमरीकी डॉलर के सामने रुपये का ये अब तक का सबसे निचला एक्सचेंज रेट है.

विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने मुद्रा की गिरावट के लिए मोदी सरकार की ख़राब आर्थिक नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराया है.

वहीं, केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि रुपये की गिरावट के पीछे अंतरराष्ट्रीय कारण हैं.

सवाल ये भी उठ रहा है कि आख़िर केंद्र सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) मुद्रा में हो रही इस गिरावट का कोई उपाय क्यों नहीं निकाल रहे हैं.

इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए हमने बात की वरिष्ठ अर्थशास्त्री इला पटनायकसे.

1. भारतीय मुद्रा के लगातार गिरने की वजह क्या है?

वरिष्ठ अर्थशास्त्री इला पटनायक कहती हैं, "भारतीय मुद्रा रुपये को इस समय कई तरह के दबावों से जूझना पड़ रहा है जिनमें बाहरी दबाव ज़्यादा हैं. उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों की मुद्राएं दबाव में हैं. कुछ देश इससे लड़ने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन हम लोग इससे बहुत ज़्यादा लड़ने की कोशिश नहीं कर रहे हैं."

इला कहता हैं, "तेल की कीमतों में वृद्धि हुई है. फेडरल रिज़र्व रेट में वृद्धि और अमरीकी सरकार से ऋण लेने की दर बढ़ने से जोख़िम की स्थिति पैदा होती है जिसकी वजह से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं में गिरावट देखी जाती है. भारतीय मुद्रा बीते काफ़ी दिनों से बेहद नियंत्रित थी जिसके चलते मुद्रा के एक्सचेंज रेट में बदलाव होने की अपेक्षा की जा रही थी. इसी वजह ये गिरावट देखी जा रही है."

भारतीय मुद्राइमेज कॉपीरइटREUTERS

2. आरबीआई मुद्रा में गिरावट क्यों नहीं रोक रही है?

अमरीकी ब्याज़ दरों में बढ़ोतरी के चलते दुनिया के तमाम उभरते हुए बाज़ारों की मु्द्राओं में गिरावट देखी जा रही है.

तुर्की की मुद्रा लीरा इसका एक उदाहरण है जिसमें हाल के दिनों में ऐतिहासिक गिरावट देखी गई है.

इसके बाद से तुर्की उन रास्तों की तलाश कर रहा है जिससे वह इस संकट से बाहर आ सके.

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ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर भारत में रिज़र्व बैंक लगातार डूबते रुपये को क्यों नहीं संभाल रहा है.

पटनायक इस सवाल का जवाब देते हुई कहती हैं, "भारत में इनफ़्लेशन रेट अमरीकी इनफ़्लेशन रेट से ज़्यादा है. ऐसे में हमारी मुद्रा को पिछले तीन चार सालों में गिरना चाहिए था. लेकिन जब कैपिटल फ़्लो होता है तो मुद्रा का तालमेल हमेशा उसके मूलभूत सिद्धांतों से अलग हो जाता है. ऐसे में अगर आप इस तालमेल को रोकने की कोशिश करेंगे तो आप मुद्रा को ज़्यादा मजबूत रखेंगे जिससे आपके निर्यात और उद्योग जगत को नुकसान होगा. आपका घरेलू व्यापार प्रभावित होगा, वो प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएगा क्योंकि आप आयात सस्ता रखेंगे. ऐसे में अगर आपकी मुद्रा में सही तालमेल नहीं है तो ये अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी बात नहीं है."

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"ऐसे में अगर अपनी मुद्रा में गिरावट आ रही है तो ये अच्छी बात है क्योंकि जब मुद्रा गिरेगी तभी मजबूत होगी. ऐसे में अगर आंतरिक और बाहरी कारणों की वजह से मुद्रा के एक्सचेंज रेट में बदलाव हो रहा हो तो उसे होने देना चाहिए. वहीं अगर आरबीआई की ज़िम्मेदारी की बात करें तो संसद ने आरबीआई को इन्फ़्लेशन रोकने का काम दिया है."

3. अगर आरबीआई गिरावट रोके तो क्या होगा?

कांग्रेस और बीजेपी, दोनों ही विपक्ष में रहते हुए भारतीय मुद्रा में गिरावट के लिए सत्तारूढ़ पार्टी की ख़राब आर्थिक नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराती रही हैं.

ऐसे में अगर आरबीआई राजनीतिक दबाव में आकर मुद्रा में गिरावट रोकने की कोशिश करेगी तो इसके क्या परिणाम सामने आएंगे.

पटनायक इस सवाल के जवाब में कहती हैं, "अगर आरबीआई दबाव के चलते कुछ करने की कोशिश करती है तो वो ब्याज़ दरें बढ़ाएगी क्योंकि रुपये की गिरावट को रोकने का वही एक तरीका होता है. बैंक ऑफ़ इंडोनेशिया भी ऐसा ही कर रहा है, वहाँ पर ब्याज़ दरें काफ़ी ज़्यादा हैं. ऐसे में अगर आरबीआई भी ऐसा ही करेगा तो इसका उद्योग जगत पर ख़राब असर पड़ेगा."

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4. आम आदमी आरबीआई से क्या उम्मीद करे?

भारत में आम लोग रुपये के गिरने को अर्थव्यवस्था में गिरावट के प्रतीक के रूप में देखते हैं.

आरबीआई से आम आदमी की उम्मीदों को लेकर पटनायक कहती हैं, "लोगों को ये उम्मीद होनी चाहिए कि आरबीआई कोई पैनिक बटन इस्तेमाल न करे. क्योंकि अगर वह दबाव में आकर ब्याज़ दरों में वृद्धि करने लगे तो जिस तरह 2013 में ब्याज़ दरें बढ़ाने अर्थव्यवस्था में और गिरावट देखी गई. निवेश कम हुआ, क्रेडिट ग्रोथ कम हुई, रोजगार की दर में कमी आई, फिर से वही सारी चीज़ें दोबारा होंगी. आम आदमी को इससे ज़्यादा नुकसान पहुंचेगा."

"रुपया जब 72 या 73 के स्तर पर होता है तो तेल की कीमतों और मोबाइल की कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में आम आदमी को उतना फर्क नहीं पड़ता जितना तब पड़ता है जब अर्थव्यस्था में ब्याज़ दरें बढ़ा दी जाएं. बैंक की क्रेडिट ग्रोथ कम हो जाये और रोजगार में कमी आ जाए. वो ज़्यादा नुकसादायक है."

 
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