ढोल नृत्य

विवाह आदि मांगलिक अवसरों पर किया जाने वाला जालोर का ढोल नृत्य राजस्थान का एक प्रमुख लोकनृत्य है । प्रायः सरगरा, ढोली और भील जातियों द्वारा किया जाने वाला यह नृत्य प्ररूष प्रधान नृत्य है । इस नृत्य में एक कलाकार दो-तीन ढोल अपने शरीर पर रखकर उन्हें बजाता है और कई कलाकार एक साथ मिलकर कई ढोल बजाते हैं । किवदंती है कि जब जालोर बसा था उन्हीं दिनों सिवाणा गांव के खींवसिंह राठौड़ का सरगरा जाति की युवती से प्रेम हो गया और वह सिवाणा छोड़कर जालोर आ गया । यहां आकर खींवसिंह ढोल बजाने लग गया और जालोर का ढोल नृत्य प्रसिद्ध हो गया । जब एक वादक तीन ढोल एक साथ रखता है, तब वह एक अपने सिर पर रखता है, एक सामने की तरफ और एक पीछे रखता है । इन्हें रस्सी से इस तरह बांध दिया जाता है ताकि नर्तक को नाचने और वादन में परेशानी न हो और ढोल खुले नहीं । ढोल लय वादन के साथ नृत्य का यह दृश्य गति और जोशीली भाव-भंगिमाएं प्रस्तुत करती हैं-

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जनजातीय और लोक संगीत

जनजातीय और लोक संगीत उस तरीके से नहीं सिखाया जाता है जिस तरीके से भारतीय शास्‍त्रीय संगीत सिखाया जाता है । प्रशिक्षण की कोई औपचारिक अवधि नहीं है। छात्र अपना पूरा जीवन संगीत सीखने में अर्पित करने में समर्थ होते हैं । ग्रामीण जीवन का अर्थशास्‍त्र इस प्रकार की बात के लिए अनुमति नहीं देता । संगीत अभ्‍यासकर्ताओं को शिकार करने, कृषि अथवा अपने चुने हुए किसी भी प्रकार का जीविका उपार्जन कार्य करने की इजाजत है। Read More : जनजातीय और लोक संगीत about जनजातीय और लोक संगीत

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