जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं ? - हरिशंकर परसाई
Submitted by vasna on 25 December 2019 - 1:09pmकिसी के निर्देश पर चलना नहीं स्वीकार मुझको
नहीं है पद चिह्न का आधार भी दरकार मुझको
ले निराला मार्ग उस पर सींच जल कांटे उगाता
और उनको रौंदता हर कदम मैं आगे बढ़ाता
शूल से है प्यार मुझको, फूल पर कैसे चलूं मैं?
बांध बाती में हृदय की आग चुप जलता रहे जो
और तम से हारकर चुपचाप सिर धुनता रहे जो
जगत को उस दीप का सीमित निबल जीवन सुहाता
यह धधकता रूप मेरा विश्व में भय ही जगाता
प्रलय की ज्वाला लिए हूं, दीप बन कैसे जलूं मैं? Read More : जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं ? - हरिशंकर परसाई about जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं ? - हरिशंकर परसाई



