सुवा की खेती

सुवा की वैज्ञानिक खेती
जलवायु :-

यह रबी (शरद ऋतु) के मौसम में ली जाने वाली फसल है, जिसके लिए शुष्क एवं ठंडा मौसम अनुकूल होता है| सुवा की फसल को पाला लगने की सम्भावना रहती है|वातावरण में अधिक नमी होने पर सुवा की फसल को कीटो व् रोगो से ग्रसित होने की अधिक संभावनाए होती है|   

भूमि एवं इसकी तैयारी :-

सुवा फसल को बलुई मिटटी छोड़कर सभी प्रकार की मिटटी में खेती की जा सकती है| किसान ध्यान दे की सुवा के लिए दोमट अथवा चिकनी दोमट मिटटी जिसमे ह्यूमस (आर्गेनिक मैटर) उचित मात्रा में हो साथ ही साथ खेत से जल निकास की समुचित प्रबंध हो, सुवा की खेती के लिए उत्तम होती है| किसान खेत की तैयारी के लिए एक गहरी जुताई के साथ दो- तीन उथली जुताई करने के बाद पाटा लगाना अच्छा रहता है| किसान खेत को बुआई से पूर्व छोटी छोटी क्यारियों में बाँट लेना चाहिए ताकि जल समान रूप से क्यारी में लग सके|

खेत में अगर दीमक की समस्या हो तो किसान क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत या मिथाइल पैराथीओन 2.0  प्रतिशत में से किसी एक कीटनाशी दवा के 25 किलोग्राम  प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में सामान रूप से बिखेर के मिला देना चाहिए|

बुआई का समय – असिचित इलाको में किसान सुवा की बुआई थोड़ी जल्दी यानी वर्षा ऋतु समाप्त होते ही अर्थात मध्य अगस्त से मध्य सितम्बर माह में करें, जबकि सिचित इलाको में मध्य अक्टूबर से मध्य नवम्बर के महीने में करें|

बीज दर – सिचित क्षेत्रो में किसान 3.0 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई करें जबकि असिचित क्षेत्र में 5.0 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर से बुआई करें| बीज को बुआई से पूर्व कैप्टान या थाइरम या बाविस्टिन से 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बुआई करनी चाहिए|

बुआई की विधि- सुवा की बुआई में दो विधियाँ प्रचलित है-

छिटकवाँ विधि
कतार विधि – इस विधि में कतार से कतार की दुरी 60 से.मि. (सिचित) एवं 40 से.मि  (असिचित) में होनी चाहिए तथा पौधे से पौधे की दुरी 20-30 से.मि. रखनी चाहिए| किसान सुवा की बुआई  2.0 से. मी. से ज्यादा गहराई पर नहीं करे|

सुवा की उन्नत किस्में-  

एन. आर. सी. एस.एस. -ए.डी.-1 :- युरोपियन सुवा (डिल) की किस्म है जो सिचित क्षेत्रो में खेती करने पर अच्छी पैदावार देती है| यह किस्म 142 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है| इसकी औसत उपज 14.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है| तथा बीजो में 3.5 प्रतिशत वाष्पशील तेल पाया जाता है|
एन. आर. सी. एस.एस. -ए.डी.-2 :- यह भारतीय सुवा की उन्नत किस्म है, इस किस्म को बारानी खेती या असिचित तथा कम पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रो में अच्छी पैदावार के लिए किसानो द्वारा बुआई की जाती है| यह किस्म 135 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है| इसकी औसत उपज 14.6 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है| तथा बीजो में 3.2 प्रतिशत वाष्पशील तेल पाया जाता है|
स्थानीय किस्में: मेहसाना व् रूबी गुजरात  में बुआई की जाती है| वहीं राजस्थान में प्रतापगढ़ लोकल

सुवा के औषधीय गुण-  सुवा के बीजो से निकाले गये वाष्पशील तेल का प्रयोग कई प्रकार कई दवाओं के निर्माण में करते है| सुवा के तेल में पानी मिलाकर डिल वाटर बनाया जाता है जो छोटे बच्चो को अफरा, पेट दर्द तथा हिचकी जैसी परिस्थितयो में दिया जाता है| सुवा के बीजो से निकाले गये वाष्पशील तेल को ग्राइप वाटर बनाने में भी प्रयोग किया जाता है| सुवा खाद्य के रूप में इसके साबुत या पीसे हुए बीज सूप, सलाद, सॉस, व् अचार में डाले जाते है| सुवा के हरे एवं मुलायम तने, पत्तिया, पुष्पक्रम भी सूप को सुवासित करने में प्रयोग होता है|

गराडू की खेती लाभ की खेती -

गराडू की खेती

पिछले 10 सालो से गराडू की खेती कर रहे हैं अपनी ही किस्म गजराज बना ली अनुसंधान कर के नागर ने कृषक नन्दराम नागर अन्य किसानो की तरह परम्परागत खेती करते थे ।परन्तु उसमे लागत ज्यादा व् लाभ कम मिलता था । ईस कारण से कुछ अलग फसल उगाने का सोचा वेसे तो नागर मिर्च व टमाटार की खेती कई सालो से करते आ रहे हैं परन्तु ईस फसल मैं वायरस ब्लाइट लगने से वह नष्ट हो गए ।उसके बाद नागर ने गराडू की फसल लगाई व् अब वह एक एकड दो ल Read More : गराडू की खेती लाभ की खेती - about गराडू की खेती लाभ की खेती -

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