सूर्य चिकित्सा

सूर्य चिकित्सा के सिद्धान्त के अनुसार रोगोत्पत्ति का कारण शरीर में रंगों का घटना-बढना है। सूर्य किरण चिकित्सा के अनुसार अलग‍-अलग रंगों के अलग-अलग गुण होते हैं। लाल रंग उत्तेजना और नीला रंग शक्ति पैदा करता है। इन रंगों का लाभ लेने के लिए रंगीन बोतलों में आठ-नौ घण्टे तक पानी रखकर उसका सेवन किया जाता है।

सौरमंडल के 9 ग्रहों में से पृथ्वी को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। पृथ्वी को यह खास दर्जा इसलिए प्राप्त है क्योंकि यह एक ग्रह ऐसा है जहां जीवन पाया जाता है। सौरमंडल के अन्य ग्रहों पर जीवन के कोई पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। पृथ्वी पर जीवन के लायक परिस्थितियां पनपने में अन्य बातों के साथ−साथ सूर्य से एक निश्चित दूरी का बहुत बड़ा योगदान है। यदि सूर्य पृथ्वी से बहुत दूर या पृथ्वी के बहुत करीब होता तो पृथ्वी पर प्राणी जीवन संभव नहीं होता। सूर्य से पृथ्वी की संतुलित दूरी ने ही पृथ्वी के वातावरण को जीवन के लायक बनाया।

 
आदिकाल से ही सूर्य को शक्ति का पुंज माना गया है। सच भी है सौरमंडल में जब तक सूर्य है तब तक ही पृथ्वी पर हमारा आस्तित्व कायम रह सकेगा। ऊर्जा के इस परम स्रोत के प्रकाश में अनेक ऐसे गुण मौजूद होते हैं जिनके द्वारा कई रोगों का उपचार किया जा सकता है। सूर्य के द्वारा की जा सकने वाली यह चिकित्सा पूरी तरह प्राकृतिक होती है। सूर्य चिकित्सा के अंतर्गत अनन्त प्रकृति से अनंत प्राण की सुरक्षा की जाती है। इस चिकित्सा में किसी प्रकार की दवाई या जड़ी−बूटी का प्रयोग नहीं किया जाता। सूर्य चिकित्सा में सूर्य की किरणें ही उपचार का साधन होती हैं।
 
सन् 1666 में सर आइजक न्यूटन ने एक बंद कमरे में एक छेद से आते हुए सूर्य के प्रकाश को एक प्रिज्म की सहायता से दीवार पर डाला तो दीवार पर सात रगों की एक पट्टी बन गई। इस पट्टी के एक सिरे पर लाल तथा दूसरे सिरे पर बैंगनी रंग था। इसके अलावा उस पट्टी में नारंगी, पीला, हरा तथा नीला रंग भी था। इन्हीं सातों रंगों के मिश्रण के फलस्वरूप हमें सफेद धूप दिखाई देती है। इन सात रंगों की अपनी−अपनी विशेषताएं हैं जिनके आधार पर इन्हें विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए चुना जाता है किसी भी रोग के उपचार के लिए इन रंगों का उपयोग स्वतंत्र रूप से किया जाना चाहिए परन्तु सुविधा तथा सरलता के लिए प्रायः सूर्य−चिकित्सक इन रंगों को तीन समूहों में बांट लेते हैं। दूसरी ओर प्रत्येक समूह के रंगों के प्रभाव में बहुत कम अन्तर पाया जाता है इसलिए भी ऐसा किया जाता है।

प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली खुराक चिकित्सा

प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली खुराक चिकित्सा शुद्धि कर्म, जल चिकित्सा, ठण्डी पट्टी, मिटटी की पट्टी, विविध प्रकार के स्नान, मालिश्‍ा प्राकृतिक चिकित्सक, पोषण चिकित्सा, भौतिक चिकित्सा, वानस्पतिक चिकित्सा, आयुर्वेद आदि पौर्वात्य चिकित्सा, होमियोपैथी, छोटी-मोटी शल्यक्रिया, मनोचिकित्सा,  जल चिकित्सा, होमियोपैथी, सूर्य चिकित्सा, एक्यूपंक्चर, एक्यूप्रेशर, मृदा चिकित्सा, उष्ण टावल से स्वेदन, कटि स्नान, टब स्नान, फुट बाथ, परिषेक, वाष्प स्नान, कुन्जल, नेति आदि का प्रयोग वात जन्य रोग पक्षाद्घात राधृसी, शोध, उदर रोग, प्रत

इस थेरेपी के अनुसार, भोजन प्राकृतिक रूप में लिया जाना चाहिए। ताज़े मौसमी फल, ताज़ी हरी पत्तेदार सब्जियां और अंकुरित भोजन बहुत ही लाभकारी हैं। ये आहार मोटे तौर पर तीन प्रकार में विभाजित हैं जो इस प्रकार हैं: Read More : प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली खुराक चिकित्सा about प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली खुराक चिकित्सा

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Dr. Popat Sonawane - Orthopaedic Surgeon, ghodnadi-shirur

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