क्या है न्यूरोडेवेलेपमेंटल डिसऑर्डर?

क्या है न्यूरोडेवेलेपमेंटल डिसऑर्डर?

एडीएचडी, यानि एक तरह का न्यूरोडेवेलेपमेंटल डिसऑर्डर. आम तौर पर ये लड़कियों के मुक़ाबले लड़कों में ज़्यादा पाया जाता है.

लेकिन बहुत सी लड़कियों में ये लड़कों से भी ज़्यादा ख़तरनाक स्तर पर हो सकता है. मुख्य तौर पर ये डिसऑर्डर तीन तरह का होता है.

इसमें मरीज़ का दिमाग़ चीज़ों पर फ़ोकस नहीं कर पाता. छोटी-छोटी चीज़ों को बहुत जल्दी भूलता रहता है. इसका दूसरा रूप हम तब देखते हैं, जब मरीज़ बहुत ज़्यादा एक्टिव और बातूनी हो जाता है. वो कहीं भी घड़ी भर को टिक कर नहीं बैठ पाता.

एडीएचडी के तीसरे रूप में ये दोनों ही लक्षण हो सकते हैं. आम तौर पर ये कंडीशन बच्चों में ज़्यादा होती है. लेकिन सही समय पर इलाज ना मिले तो बच्चा इसी मिज़ाज के साथ बड़ा हो जाता है.

लड़कों में ये बीमारी आमतौर पर शुरूआत में ही पकड़ में आ जाती है. जबकि लड़कियों को कई बार सारी उम्र इस डिसऑर्डर से जूझना पड़ता है.

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वजह एकदम साफ़ है. अन्य बीमारियों की तरह इस बीमारी पर भी लड़कियों के मुक़ाबले लड़कों पर रिसर्च ज़्यादा हुई है.

एमिली जॉन्सन फ़र्गुसन के तौर पर ऐसी ही एक मिसाल हमारे सामने है. किशोरावस्था में ही उनके दिमाग़ ने धीमी गति से काम करना शुरू कर दिया था.

न्यूरोडेवेलेपमेंटल डिसऑर्डरइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

नज़रअंदाज़ न करें

लेकिन उनकी बीमारी 42 साल की उम्र में पकड़ में आई. एमिली जैसी ही ना जाने कितनी महिलाएं हैं, जो इस बीमारी के साथ ही जीती रहती हैं लेकिन उनका मर्ज़ पकड़ में नहीं आता.

अमरीका की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में बच्चों की मनोवैज्ञानिक एनी अर्नेट की रिसर्च के मुताबिक़ लड़के और लड़की में एडीएचडी के लक्षण भी अलग-अलग तरह से सामने आते हैं. और ये फ़र्क़ न्यूरोबायोलॉजिकल फ़र्क़ की वजह से होता है.

अगर किसी जगह कि पूरी आबादी में एडीएचडी का अनुपात निकाला जाए तो उसके लिए रिसर्च का साइज़ बहुत मायने रखता है.

लेकिन मोटे तौर पर लड़के और लड़कियों में ये अनुपात 2:1 और 10:1 हो सकता है.

रिसर्चर फ़्लोरेंस मॉलेम का कहना है कि एडीएचडी के मरीज़ों पर की गई रिसर्च में लड़कियों को नज़रअंदाज़ किया गया है.

अगर सही तरह से रिसर्च की जाए तो हो सकता है कि लड़कियों में एडीएचडी ज़्यादा पाया जाता हो.

फ्लोरेंस की रिसर्च के मुताबिक़ लड़कियों में एडीएचडी के लक्षण अगर नज़र आते भी हैं तो उन पर ध्यान नहीं दिया जाता.

मिसाल के लिए फ़्लोरेंस की रिसर्च में जितने माता-पिता शामिल हुए थे ख़ुद उन्होंने अपनी लड़कियों के हाईपरएक्टिव होने को कम करके आंका था.

न्यूरोडेवेलेपमेंटल डिसऑर्डरइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

Image captionलड़कों की अपेक्षा एडीएचडी से पीड़ित लड़कियों के डिप्रेशन के शिकार होने की आशंका अधिक होती है.

बर्ताव के संकेत

एडीएचडी वाली लड़कियों में भावुक होने के लक्षण भी पाए जाते हैं साथ ही उनका बर्ताव भी उन लड़कियों से अलग होता है जिनमें एडीएचडी नहीं होता. लेकिन लड़कों में ये लक्षण नहीं पाए जाते.

फ़्लॉरेंस ने एक और रिसर्च में पाया कि अगर लड़कियों में हाईपरएक्टिव, उतावलापन और बर्ताव में अंतर होता है, तो उनकी बीमारी जल्द ही पकड़ में आ सकती है.

लंदन एनएचएस ट्रस्ट की रिसर्चर हेलेन रीड कहती हैं कि अगर लड़कियां, लड़कों के मुक़ाबले ज़्यादा उछल-कूद करती हैं, तो उन्हें ऐसा करने से रोका जाता है.

जबकि वजह समझने की कोशिश नहीं की जाती. बहरहाल सही वजह समझने के लिए अभी और ज़्यादा रिसर्च की ज़रूरत है.

आम धारणा है कि लड़कियां, लड़कों के मुक़ाबले ज़्यादा लापरवाह होती हैं. लेकिन ये ग़लत धारणा है.

हाल की रिसर्च बताती है कि लापरवाही का आलम दोनों में बराबर तौर पर पाया जाता है.

बल्कि अगर कहा जाए की एडीएचडी के साथ वाले बच्चों में तमाम लक्षण समान होते हैं तो ग़लत नहीं होगा. हां, इतना ज़रूर है कि एडीएचडी वाली लड़कियों में बढ़ती उम्र के साथ तनाव और चिंता ज़्यादा होने लगती है.

 

न्यूरोडेवेलेपमेंटल डिसऑर्डरइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

Image captionएडीएचडी के कई मरीज़ हालात पर काबू पाने के लिए दवाएं लेते हैं.

इला हो सकता है

90 के दशक में की गई एक रिसर्च तो यहां तक कहती है कि जिन लड़कियों में बचपन में ही एडीएचडी की पुष्टि हो जाती है उनमें आगे चलकर ख़ुद को तकलीफ़ पहुंचाने और आत्महत्या जैसी सोच पनपने लगती है.

कुछ रिसर्चरों का मत है कि अगर वक़्त पर एडीएचडी पकड़ में आ जाए और इसका इलाज शुरू हो जाए तो लंबे वक़्त में होने वाले नुक़सान से बचा जा सकता है.

जबकि एक अन्य रिसर्च का कहना कि ये एक स्थाई स्थिति है, जिसे दवाओं से ख़त्म नहीं किया जा सकता. अलबत्ता कंट्रोल ज़रूर किया जा सकता है.

एमिली फ़र्गुसन का कहना है कि जब से उनका इलाज शुरू हुआ है उनकी ज़िंदगी बिल्कुल बदल गई है. अब वो अपने तमाम काम पर फोकस करने लगी हैं.

लेकिन एडीएचडी का शिकार सभी मरीज़ एमिली जैसे नसीब वाले नहीं होते. उनकी ज़िंदगी यूं ही तमाम हो जाती है.

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