हरिशंकर परसाई

पुराना खिलाड़ी - हरिशंकर परसाई

हरिशंकर परसाई
लेखक: 
हरिशंकर परसाई

सरदारजी जबान से तंदूर को गर्म करते हैं। जबान से बर्तन में गोश्त चलाते हैं। पास बैठे आदमी से भी इतने जोर से बोलते हैं, जैसे किसी सभा में बिना माइक बोल रहे हों। होटल के बोर्ड पर लिखा है - ‘यहाँ चाय हर वक्त तैयार मिलती है।’ नासमझ आदमी चाय माँग बैठता है और सरदारजी कहते हैं - चाय ही बेचना होता, तो उसे बोर्ड पर क्यूँ लिखता बाश्शाओ! इधर नेक बच्चों के लिए कोई चाय नहीं है। समझदार ‘चाय’ का मतलब समझते हैं और बैठते ही कहते हैं - एक चवन्नी !

सरदारजी मुहल्ले के रखवाले हैं। इधर के हर आदमी का चरित्र वे जानते हैं। अजनबी को ताड़ लेते हैं। तंदूर में सलाख मारते हुए चिल्लाते हैं - Read More : पुराना खिलाड़ी - हरिशंकर परसाई about पुराना खिलाड़ी - हरिशंकर परसाई

अपना-पराया - हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

'आप किस स्‍कूल में शिक्षक हैं?'

'मैं लोकहितकारी विद्यालय में हूं। क्‍यों, कुछ काम है क्‍या?'

'हाँ, मेरे लड़के को स्‍कूल में भरती करना है।'

'तो हमारे स्‍कूल में ही भरती करा दीजिए।'

'पढ़ाई-‍वढ़ाई कैसी है?

'नंबर वन! बहुत अच्‍छे शिक्षक हैं। बहुत अच्‍छा वातावरण है। बहुत अच्‍छा स्‍कूल है।'

'आपका बच्‍चा भी वहाँ पढ़ता होगा?'

'जी नहीं, मेरा बच्‍चा तो 'आदर्श विद्यालय' में पढ़ता है।' Read More : अपना-पराया - हरिशंकर परसाई about अपना-पराया - हरिशंकर परसाई

मुंडन - हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

किसी देश की संसद में एक दिन बड़ी हलचल मची। हलचल का कारण कोई राजनीतिक समस्या नहीं थी, बल्कि यह था कि एक मंत्री का अचानक मुंडन हो गया था। कल तक उनके सिर पर लंबे घुँघराले बाल थे, मगर रात में उनका अचानक मुंडन हो गया था।

सदस्यों में कानाफूसी हो रही थी कि इन्हें क्या हो गया है। अटकलें लगने लगीं। किसी ने कहा - शायद सिर में जूँ हो गई हों। दूसरे ने कहा - शायद दिमाग में विचार भरने के लिए बालों का पर्दा अलग कर दिया हो। किसी और ने कहा - शायद इनके परिवार में किसी की मौत हो गई। पर वे पहले की तरह प्रसन्न लग रहे थे। Read More : मुंडन - हरिशंकर परसाई about मुंडन - हरिशंकर परसाई

जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं ? - हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

किसी के निर्देश पर चलना नहीं स्वीकार मुझको
नहीं है पद चिह्न का आधार भी दरकार मुझको
ले निराला मार्ग उस पर सींच जल कांटे उगाता
और उनको रौंदता हर कदम मैं आगे बढ़ाता

शूल से है प्यार मुझको, फूल पर कैसे चलूं मैं?

बांध बाती में हृदय की आग चुप जलता रहे जो
और तम से हारकर चुपचाप सिर धुनता रहे जो
जगत को उस दीप का सीमित निबल जीवन सुहाता
यह धधकता रूप मेरा विश्व में भय ही जगाता

प्रलय की ज्वाला लिए हूं, दीप बन कैसे जलूं मैं? Read More : जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं ? - हरिशंकर परसाई about जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं ? - हरिशंकर परसाई

अपनी अपनी बीमारी - हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

हम उनके पास चंदा माँगने गए थे। चंदे के पुराने अभ्यासी का चेहरा बोलता है। वे हमें भाँप गए। हम भी उन्हें भाँप गए। चंदा माँगनेवाले और देनेवाले एक-दूसरे के शरीर की गंध बखूबी पहचानते हैं। लेनेवाला गंध से जान लेता है कि यह देगा या नहीं। देनेवाला भी माँगनेवाले के शरीर की गंध से समझ लेता है कि यह बिना लिए टल जाएगा या नहीं। हमें बैठते ही समझ में आ गया कि ये नहीं देंगे। वे भी शायद समझ गए कि ये टल जाएँगे। फिर भी हम दोनों पक्षों को अपना कर्तव्य तो निभाना ही था। हमने प्रार्थना की तो वे बोले - आपको चंदे की पड़ी है, हम तो टैक्सों के मारे मर रहे हैं। सोचा, यह टैक्स की बीमारी कैसी होती है। बीमारियाँ बहुत दे Read More : अपनी अपनी बीमारी - हरिशंकर परसाई about अपनी अपनी बीमारी - हरिशंकर परसाई

सुधार - हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

एक जनहित की संस्‍था में कुछ सदस्‍यों ने आवाज उठाई, 'संस्‍था का काम असंतोषजनक चल रहा है। इसमें बहुत सुधार होना चाहिए। संस्‍था बरबाद हो रही है। इसे डूबने से बचाना चाहिए। इसको या तो सुधारना चाहिए या भंग कर देना चाहिए।

संस्‍था के अध्‍यक्ष ने पूछा कि किन-किन सदस्‍यों को असंतोष है।

दस सदस्‍यों ने असंतोष व्‍यक्‍त किया।

अध्‍यक्ष ने कहा, 'हमें सब लोगों का सहयोग चाहिए। सबको संतोष हो, इसी तरह हम काम करना चाहते हैं। आप दस सज्‍जन क्‍या सुधार चाहते हैं, कृपा कर बतलावें।'

और उन दस सदस्‍यों ने आपस में विचार कर जो सुधार सुझाए, वे ये थे - Read More : सुधार - हरिशंकर परसाई about सुधार - हरिशंकर परसाई

यस सर - हरिशंकर परसाई

यस सर - हरिशंकर परसाई
लेखक: 
हरिशंकर परसाई

एक काफी अच्छे लेखक थे। वे राजधानी गए। एक समारोह में उनकी मुख्यमंत्री से भेंट हो गई। मुख्यमंत्री से उनका परिचय पहले से था। मुख्यमंत्री ने उनसे कहा - आप मजे में तो हैं। कोई कष्ट तो नहीं है? लेखक ने कह दिया - कष्ट बहुत मामूली है। मकान का कष्ट। अच्छा सा मकान मिल जाए, तो कुछ ढंग से लिखना-पढ़ना हो। मुख्यमंत्री ने कहा - मैं चीफ सेक्रेटरी से कह देता हूँ। मकान आपका 'एलाट' हो जाएगा।

मुख्यमंत्री ने चीफ सेक्रेटरी से कह दिया कि अमुक लेखक को मकान 'एलाट' करा दो।

चीफ सेक्रेटरी ने कहा - यस सर।

चीफ सेक्रेटरी ने कमिश्नर से कह दिया। कमिश्नर ने कहा - यस सर। Read More : यस सर - हरिशंकर परसाई about यस सर - हरिशंकर परसाई

भारत को चाहिए जादूगर और साधु - हरिशंकर परसाई

हरिशंकर परसाई
लेखक: 
हरिशंकर परसाई

हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को मैं सोचता हूँ कि साल-भर में कितने बढ़े। न सोचूँ तो भी काम चलेगा - बल्कि ज्यादा आराम से चलेगा। सोचना एक रोग है, जो इस रोग से मुक्त हैं और स्वस्थ हैं, वे धन्य हैं।

यह 26 जनवरी 1972 फिर आ गया। यह गणतंत्र दिवस है, मगर 'गण' टूट रहे हैं। हर गणतंत्र दिवस 'गण' के टूटने या नए 'गण' बनने के आंदोलन के साथ आता है। इस बार आंध्र और तेलंगाना हैं। अगले साल इसी पावन दिवस पर कोई और 'गण' संकट आएगा। Read More : भारत को चाहिए जादूगर और साधु - हरिशंकर परसाई about भारत को चाहिए जादूगर और साधु - हरिशंकर परसाई

शर्म की बात पर ताली पीटना - हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

मैं आजकल बड़ी मुसीबत में हूँ।

मुझे भाषण के लिए अक्सर बुलाया जाता है। विषय यही होते हैं - देश का भविष्य, छात्र समस्या, युवा-असंतोष, भारतीय संस्कृति भी (हालांकि निमंत्रण की चिट्ठी में 'संस्कृति' अक्सर गलत लिखा होता है), पर मैं जानता हूँ जिस देश में हिंदी-हिंसा आंदोलन भी जोरदार होता है, वहाँ मैं 'संस्कृति' की सही शब्द रचना अगर देखूँ तो बेवकूफ के साथ ही 'राष्ट्र-द्रोही' भी कहलाऊँगा। इसलिए जहाँ तक बनता है, मैं भाषण ही दे आता हूँ। Read More : शर्म की बात पर ताली पीटना - हरिशंकर परसाई about शर्म की बात पर ताली पीटना - हरिशंकर परसाई

आवारा भीड़ के खतरे हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

एक अंतरंग गोष्ठी सी हो रही थी युवा असंतोष पर। इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत वर्मा ने बताया - पिछली दीपावली पर एक साड़ी की दुकान पर काँच के केस में सुंदर साड़ी से सजी एक सुंदर मॉडल खड़ी थी। एक युवक ने एकाएक पत्थर उठाकर उस पर दे मारा। काँच टूट गया। आसपास के लोगों ने पूछा कि तुमने ऐसा क्यों किया? उसने तमतमाए चेहरे से जवाब दिया - हरामजादी बहुत खूबसूरत है। Read More : आवारा भीड़ के खतरे हरिशंकर परसाई about आवारा भीड़ के खतरे हरिशंकर परसाई

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