हरिशंकर परसाई

चंदे का डर - हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

एक छोटी-सी समिति की बैठक बुलाने की योजना चल रही थी। एक सज्‍जन थे जो समिति के सदस्‍य थे, पर काम कुछ नहीं, गड़बड़ पैदा करते थे और कोरी वाहवाही चाहते थे। वे लंबा भाषण देते थे।

वे समिति की बैठक में नहीं आवें, ऐसा कुछ लोग करना चाहते थे, पर वे तो बिना बुलाए पहुँचने वाले थे। फिर यहाँ तो उनको निमंत्रण भेजा ही जाता, क्‍योंकि वे सदस्‍य थे। Read More : चंदे का डर - हरिशंकर परसाई about चंदे का डर - हरिशंकर परसाई

आँगन में बैंगन - हरिशंकर परसाई

आँगन में बैंगन - हरिशंकर परसाई
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हरिशंकर परसाई

मेरे दोस्‍त के आँगन में इस साल बैंगन फल आए हैं। पिछले कई सालों से सपाट पड़े आँगन में जब बैंगन का फल उठा तो ऐसी खुशी हुई जैसे बाँझ को ढलती उम्र में बच्‍चा हो गया हो। सारे परिवार की चेतना पर इन दिनों बैंगन सवार है। बच्‍चों को कहीं दूर पर बकरी भी दीख जाती है तो वे समझते हैं कि वह हमारे बैंगन के पौधों को खाने के बारे में गंभीरता से विचार कर रही है। वे चिल्‍लाने लगते हैं। पिछले कुछ दिनों से परिवार में बैंगन को ही बात होती है। जब भी जाता हूँ परिवार की स्त्रियाँ कहती है - खाना खा लीजिए। घर के बैंगन बने हैं। जब वे 'भरे भटे' का अनुप्रास साधती हैं तब उन्‍हें काव्‍य-रचना का आनंद आ जाता है। मेरा मित्र Read More : आँगन में बैंगन - हरिशंकर परसाई about आँगन में बैंगन - हरिशंकर परसाई

समझौता - हरिशंकर परसाई

समझौता - हरिशंकर परसाई
लेखक: 
हरिशंकर परसाई

अगर दो साइकिल सचार सड़क पर एक-दूसरे से टकराकर गिर पड़े तो उनके लिए यह लाजिमी हो जाता है कि वे उठकर सबसे पहले लड़ें, फिर धूल झाड़ें। यह पद्धति इतनी मान्‍यता प्राप्‍त कर चुकी हैं कि गिरकर न लड़ने वाला साइकिल सवार बुजदिल माना जाता है, क्षमाशील संत नहीं।

एक दिन दो साइकिलें बीच सड़क पर भिड़ गईं। उनके सवार जब उठे तो एक-दूसरे को ललकारा, 'अंधा है क्‍या? दिखता भी नहीं।'

दूसरे ने जवाब दिया, 'साले, गलत 'साइड' से चलेंगे और आँखें दिखाएँगे।'

पहले ने गाली का बदला उससे बड़ी गाली से चुकाकर ललकारा, 'जबान सँभालकर बोलना, अभी खोपड़ी फोड़ दूँगा।' Read More : समझौता - हरिशंकर परसाई about समझौता - हरिशंकर परसाई

अपील का जादू - हरिशंकर परसाई

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हरिशंकर परसाई

एक देश है! गणतंत्र है! समस्याओं को इस देश में झाड़-फूँक, टोना-टोटका से हल किया जाता है! गणतंत्र जब कुछ चरमराने लगता है, तो गुनिया बताते हैं कि राष्ट्रपति की बग्घी के कील-काँटे में कुछ गड़बड़ आ गई है। राष्ट्रपति की बग्घी की मरम्मत कर दी जाती है और गणतंत्र ठीक चलने लगता है। सारी समस्याएँ मुहावरों और अपीलों से सुलझ जाती हैं। सांप्रदायिकता की समस्या को इस नारे से हल कर लिया गया - हिंदू-मुस्लिम, भाई-भाई! Read More : अपील का जादू - हरिशंकर परसाई about अपील का जादू - हरिशंकर परसाई

एक अशुद्ध बेवकूफ - हरिशंकर परसाई

एक अशुद्ध बेवकूफ - हरिशंकर परसाई
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हरिशंकर परसाई

बिना जाने बेवकूफ बनाना एक अलग और आसान चीज है। कोई भी इसे निभा देता है। Read More : एक अशुद्ध बेवकूफ - हरिशंकर परसाई about एक अशुद्ध बेवकूफ - हरिशंकर परसाई

सिद्धांतों की व्यर्थता - हरिशंकर परसाई

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हरिशंकर परसाई

अब वे धमकी देने लगे हैं कि हम सिद्धांत और कार्यक्रम की राजनीति करेंगे। वे सभी जिनसे कहा जाता है कि सिद्धांत और कार्यक्रम बताओ। ज्योति बसु पूछते थे, नंबूदरीपाद पूछते थे। मगर वे बताते नहीं थे। हम लोगों को सिद्धांतों के बारे में पिछले चालीस सालों से सुनते-सुनते इतनी एलर्जी हो गई कि हमें उसमें दाल में काला नजर आता है। जब कोई नया मुख्यमंत्री कहता है कि मैं स्वच्छ प्रशासन दूँगा तब हमें घबराहट होती है। भगवान, अब क्या होगा? ये तो स्वच्छ प्रशासन देने पर तुले हैं। स्वच्छ प्रशासन के मारे हम लोगों की किस्मत में कब तक स्वच्छ प्रशासन लिखा रहेगा। Read More : सिद्धांतों की व्यर्थता - हरिशंकर परसाई about सिद्धांतों की व्यर्थता - हरिशंकर परसाई

संस्कृति - हरिशंकर परसाई

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हरिशंकर परसाई

भूखा आदमी सड़क किनारे कराह रहा था। एक दयालु आदमी रोटी लेकर उसके पास पहुँचा और उसे दे ही रहा था कि एक-दूसरे आदमी ने उसका हाथ खींच लिया। वह आदमी बड़ा रंगीन था।

पहले आदमी ने पूछा, 'क्यों भाई, भूखे को भोजन क्यों नहीं देने देते?'

रंगीन आदमी बोला, 'ठहरो, तुम इस प्रकार उसका हित नहीं कर सकते। तुम केवल उसके तन की भूख समझ पाते हो, मैं उसकी आत्मा की भूख जानता हूँ। देखते नहीं हो, मनुष्य-शरीर में पेट नीचे है और हृदय ऊपर। हृदय की अधिक महत्ता है।'

पहला आदमी बोला, 'लेकिन उसका हृदय पेट पर ही टिका हुआ है। अगर पेट में भोजन नहीं गया तो हृदय की टिक-टिक बंद नहीं हो जाएगी!' Read More : संस्कृति - हरिशंकर परसाई about संस्कृति - हरिशंकर परसाई

दानी - हरिशंकर परसाई

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हरिशंकर परसाई

बाढ़-पीड़ितों के लिए चंदा हो रहा था। कुछ जनसेवकों ने एक संगीत-समारोह का आयोजन किया, जिसमें धन एकत्र करने की योजना बनाई। वे पहुँचे एक बड़े सेठ साहब के पास। उनसे कहा, 'देश पर इस समय संकट आया है। लाखों भाई-बहन बेघर-बार हैं, उनके लिए अन्‍न-वस्‍त्र जुटाने के लिए आपको एक बड़ी रकम देनी चाहिए। आप समारोह में आइएगा।'

वे बोले, 'भगवान की इच्‍छा में कौन बाधा डाल सकता है। जब हरि की इच्‍छा ही है तो हम किसी की क्‍या सहायता कर सकते हैं? फिर भैया, रोज दो-चार तरह का चंदा तो हम देते हैं और व्‍यापार में कुछ दम नहीं हैं।' Read More : दानी - हरिशंकर परसाई about दानी - हरिशंकर परसाई

चूहा और मैं - हरिशंकर परसाई

चूहा और मैं - हरिशंकर परसाई
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हरिशंकर परसाई

चाहता तो लेख का शीर्षक ''मैं और चूहा'' रख सकता था। पर मेरा अहंकार इस चूहे ने नीचे कर दिया। जो मैं नहीं कर सकता, वह मेरे घर का यह चूहा कर लेता है। जो इस देश का सामान्‍य आदमी नहीं कर पाता, वह इस चूहे ने मेरे साथ करके बता दिया।

इस घर में एक मोटा चूहा है। जब छोटे भाई की पत्‍नी थी, तब घर में खाना बनता था। इस बीच पारिवारिक दुर्घटनाओं-बहनोई की मृत्‍यु आदि के कारण हम लोग बाहर रहे।

इस चूहे ने अपना अधिकार मान लिया था कि मुझे खाने को इसी घर में मिलेगा। ऐसा अधिकार आदमी भी अभी तक नहीं मान पाया। चूहे ने मान लिया है। Read More : चूहा और मैं - हरिशंकर परसाई about चूहा और मैं - हरिशंकर परसाई

रसोई घर और पाखाना - हरिशंकर परसाई

रसोई घर और पाखाना - हरिशंकर परसाई
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हरिशंकर परसाई

गरीब लड़का है। किसी तरह हाई स्‍कूल परीक्षा पास करके कॉलेज में पढ़ना चाहता है। माता-पिता नहीं हैं। ब्राह्मण है।

शहर में उसी के सजातीय सज्‍जन के यहाँ उसके रहने और खाने का प्रबंध हो गया। मैंने इस मामले में थोड़ी-सी मदद कर दी थी, इसलिए लड़का अक्‍सर मुझसे मिला करता है। बड़ा ही सरल, सभ्‍य और सीधा लड़का है। साथ ही कुशाग्रबुद्धि थी।

एक दिन मैंने पूछा, 'क्‍यों, तुम्‍हारा सब काम ठीक जम गया न? कोई तकलीफ तो नहीं है उन सज्‍जन के यहाँ?'

वह तनिक मुस्‍कराया, कहने लगा, 'तकलीफ तो नहीं है, पर वहाँ एक बात बड़ी विचित्र और मनोरंजक है।'

'क्‍या बात है?' मैंने पूछा। Read More : रसोई घर और पाखाना - हरिशंकर परसाई about रसोई घर और पाखाना - हरिशंकर परसाई

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