कृत्रिम न होओ , स्वाभाविक रहो अपने ऊपर आदर्श मत ओढो़

कृत्रिम न होओ , स्वाभाविक रहो अपने ऊपर आदर्श मत ओढो़

सहज-योग का अर्थ होता है — कृत्रिम न होओ , स्वाभाविक रहो अपने ऊपर आदर्श मत ओढो़ , आदर्श पाखंड लाते हैं ।

आदर्शों के कारण विकृति पैदा होती है ,क्योंकि कुछ तुम होते हो , कुछ तुम होने की चेष्टा करते हो , तनाव पैदा हो जाता है ।

फिर तुम जो हो वह दब जाता है , उसमें जो तुम होना चाहते हो ।

इसी का नाम पाखंड है ।
सरहपा कहता है ; तुम जैसे हो वैसे ही जीयो ।

जरा सोचो , जरा इस पर ध्यान करो ।

तुम जैसे हो वैसे ही जीयो , जो परिणाम हो । धोखा न दो ।

अपने को अन्य मत बतलाओ । अगर झूठ बोलते हो तो कह दो कि मैं झूठा हूं और भाई मेरे , मुझसे सावधान रहना , मैं झूठ बोलता हूं । झूठ ही मेरी चर्या है ।

इसलिए कोई मेरा भरोसा न करे । कोई भरोसा करे तो उसकी जोखिम , वह जाने । मैं झूठ बोलता हूं ।
जरा सोचते हो , ऐसा जो आदमी कह सके क्या वह सच्चा नहीं हो गया ? इस कहने में ही सच्चा हो गया ।

इससे बडी़ और सचाई क्या होगी कि चोर आकर तुमसे कह जाये

कि रात जरा सावधान रहना , कि मेरी नजर तुम्हारी तिजोडी़ पर

लगी है , कि मैं आदमी चोर हूं , कि मैं आदमी भला नहीं हूं ,कि मैं 

लाख दोस्ती बनाऊं तुम सचेत रहना ।

ऐसा चोर चोर है । ऐसा चोर साधु हो गया !
इस चोर ने अपनी स्वाभाविकता को उदघोषित कर दिया ।

इस चोर ने अपनी निजता को प्रगट कर दिया ।

अब यह असाधु कैसे हो सकता है ।

इसका पाखंड न रहा ।
फिर एक आदमी है , जो दावा तो सच बोलने का करता है और आड़ में झूठ बोलता है । जिनको भी झूठ बोलना है उन्हें सच बोलने का दावा करना होता है , नहीं तो उनका झूठ मानेगा कौन ? इसलिए झूठ बोलने वाला बार-बार दोहराता है कि मैं सच कह रहा हूं , मैं बिलकुल सच कह रहा हूं , मैं कसम खाकर कहता

हूं कि सच कह रहा हूं ।
जब भी कोई आदमी बहुत कसम खाने लगे कि मैं सच कह रहा हूं 

तो सावधान हो जाना , क्योंकि यह झूठे का लक्षण है ।
सहज-योग का अर्थ होता है ; – मत करो जटिल । मत बनो झूठ 

क्योंकि तुम जितने झूठ हो जाओगे उतने ही दुखी हो जाओगे ।

झूठ दुख लाता है , क्योंकि झूठ के कारण तुम्हारा संबंध सत्य से 

छूटने लगता है , टूटने लगता है ।
यह अस्तित्व सत्य है । इसके साथ सत्य हो जाओ तो तुम्हारा संगीत जुड़ जाये , तो तुम्हारी सरगम बैठ जाये ।

तुम इसके साथ सत्य हो जाओ तो ही तुम्हारा छंद बैठेगा और 

तुम्हारे जीवन में नृत्य होगा , उत्सव होगा ।

इसके साथ तुम सत्य हो जाओ तो इसके साथ लीन हो जाओगे ।

और उसी लीनता में समाधि है ।

और अगर तुम झूठ रहे तो तुम अलग-थलग रहोगे ।
झूठ बोलोगे , ज्यादा देर नहीं चल पायेगा । चल ही नहीं सकता ।

झूठ को चलना भी पड़ता है तो सच के पैर उधार लेने पड़ते हैं ।

और सच के पैर और झूठ की देह , इन दोनो के कारण तुम्हारे जीवन में एक द्वंद्व पैदा हो जाता है ।
और एक झूठ नहीं हजार झूठ हैं , इसलिए हजार द्वंद्व पैदा हो जाते हैं  । इन्हीं द्वंद्वों में ग्रस्त व्यक्ति नर्क में जीता है ।
सहज-योग का अर्थ होता है ; छोडो़ ये द्वंद्व , छोडो़ ये जाल ।

तुम जैसे हो वैसे अपने को स्वीकार कर लो ।

मत दिखाओ वैसा , जैसे कि तुम नहीं हो । जाने दो सब पाखंड ।

अगर कोई व्यक्ति अपनी संपूर्ण नग्नता में अपने को स्वीकार कर ले तो क्या हो ? क्रांति घट जाती है ।
सहज-योग का अर्थ होता है ; तुम जैसे हो , तुम्हें अंगीकार है ।

परमात्मा ने तुम्हें जैसा बनाया है इसमें तुम रत्ती-भर हेर-फेर नहीं 

करना चाहते हो ।

तुम परमात्मा से अपने को ज्यादा बुध्दिमान सिध्द नहीं करना चाहते हो ।

परमात्मा ने तुम्हें जैसा बनाया है उसने तुम्हें जैसा रंगा , वही तुम्हारा रंग है , वही तुम्हारा ढंग है ; तुम उससे अन्यथा होने की न

आकांक्षा करते हो न सपना देखते हो ।
सहज-योग परमात्मा के प्रति अनुग्रह का बोध है ।
सहज भाव से परमात्मा को पुकारना । बिना किसी क्षुद्र आकांक्षा से भरे , चुपचाप जीवन में बहे जाना । तैरना नहीं , संघर्ष नहीं करना , नदी जहां ले जाये उसी तरफ चलना , क्योंकि सभी नदियां अंततः सागर पहुंच जाती हैं ।                                           
अगर कोई चुपचाप बहता चले तो परमात्मा मिलना सुनिश्चित है ।

परमात्मा मिला ही हुआ है , तुम बहो कि अभी अनुभव में आ जाये । तुम जरा विश्राम करो , मगर तुम बडे़ जद्दो-जहद में लगे हो । तुम बडी़ दौड़-धूप कर रहे हो , आपाधापी में पडे़ हो ।

तुम्हारी आपाधापी और दौड़-धूप के कारण जो तुम्हारे भीतर बैठा

है वह दिखाई नहीं पड़ता ।

तुम इतने उलझे हो , इतने व्यस्त हो कि उसे देखो ही कैसे जो मौजूद ही है ।
परमात्मा तुम्हारा स्वभाव है । इसलिए परमात्मा को पाना नहीं है ।

पाने की दौड़ छोड़कर जरा बैठो और परमात्मा का अनुभव शुरु हो जाता है ।
हम शाश्वत नीड़ बनाने में लग जाते हैं , वहीं भूल हो जाती है ।

जीवन प्रवाह है ।

शाश्वत मत नीड़ बना , यायावर प्राणों के !

जीवन एक सरित-प्रवाह है और हम जगह-जगह पकड़ लेते हैं , जोर से पकड़ लेते हैं ,आसक्त हो जाते हैं ।

नीड़ बनाने में लग जाते हैं — शाश्वत नीड़ !

जैसे यहां सदा रहना है ।
सहज-योग कहता है ; यहां कुछ भी सदा रहने को नहीं ;

सभी बहा जा रहा है , प्रवाहमान है ।

सब क्षण-भंगुर है । पकडो़ मत , जीयो ।

और जो चला जाये उसे जाने दो , ताकि जो नया आ रहा है उसके 

लिए तुम्हारा हृदय खाली हो , खुला हो ।

बीते कलों का हिसाब मत रखो और आनेवाले कलों की चिंता मत करो । 

आज जो आया है , इसे नाचो , इसे गाओ , इसे गुनगुनाओ ।

और इसी गीत में प्रार्थना पूरी हो जाती है ।

इसी गीत में सिध्दों का सहज-योग सध गया , झेन फकीरों का –

क्षण-बोध सध गया । ये एक ही घटना के दो पहलू हैं ।
सहज योग ( सरहपा-तिलोपा वाणी )               # OSHO #

चौथा प्रवचन 

सहज-योग और क्षण-बोध      

से संकलित 
दिनांक 24 नवंंबर 1978

श्री ओशो आश्रम पूना 
!

Vote: 
No votes yet

जवाब विशेषज्ञ से लें

Dr. Popat Sonawane - Orthopaedic Surgeon, ghodnadi-shirur

  • सेक्स कैसे करें
  • सेक्स टाइम कैसे बढ़ाएं
  • लिंग का साइज कैसे बढ़ाएं
  • लिंग को बड़ा लम्बा और मोटा करने के घरेलू उपाय
  • सेक्स की फीलिंग को कैसे बढ़ाए
  • ओरल सेक्स कैसे करें

इस प्रकार सवालों का जवाब विशेषज्ञ से लें

सलाह शुल्क ₹500 है जिसमें आप हर सप्ताह व्हाट्सएप पर बात करके अपनी समस्या को व्यवस्थित तरीके से हल कर सकते हैं

A/c Name: Pradeep Kumar
A/c No: 5547297104
IFSC : kkbk0005321
Bank: Kotak Mahindra Bank

 
1 Start 2 Complete
Files must be less than 2 MB.
Allowed file types: gif jpg jpeg png bmp tif pict txt rtf pdf doc docx.

New Dhyan Updates

साप्ताहिक ध्यान : कल्पना द्वारा नकारात्मक को सकारात्मक में बदलना
पुनर्जन्‍म की बात
ओशो —हर चक्र की अपनी नींद
ध्यान : स्टॉप! (जैसे ही कुछ करने की वृत्ति हो, रुक जाओ।)
इसके पहले परदा गिरे! अपना गीत गा लो...
क्या यंत्र समाधि प्राप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं?
जीवन परम आनंद हो सकता है, वह इतना ऊब भरा क्यों है?
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान :: गर्भ की शांति पायें
साप्ताहिक ध्यान : ध्वनि के केंद्र में स्नान करो
ओशो – चक्र और नींद
चेतना की वह अकेली अवस्था ध्यान है।
ध्यान विधि : - ओशो
स्त्रियां पुरुष के लिए आकर्षक क्यों बनना चाहती हैं जबकि वे पुरुषों की कामुकता जरा भी पसंद नहीं करतीं ?
मृत शरीर जलाने का रहस्य
ध्यान -:पूर्णिमा का चाँद
करने की बीमारी
ओशो – पहले विचार फिर निर्विचार !
शरीर और मन दो अलग चीजें नहीं हैं।
अपनी श्वास का स्मरण रखें
ध्यान : संयम साधना
ध्यान :: कभी, अचानक ऐसे हो जाएं जैसे नहीं हैं
ओशो – तुम कौन हो ?
ध्यान : सब काल्पनिक है
प्रश्न:-क्या हम अपने अतीत के जन्‍मों को जान सकते है ?
व्यक्तियों को वस्तु मत बनाओ