ध्यान क्या है

चेतना की वह अकेली अवस्था ध्यान है।

अवस्था ध्यान है।

वही आदमी प्रेम करता है, जो बस प्रेम करता है और किसका कोई सवाल नहीं है। क्योंकि जो आदमी ‘किसी से’ प्रेम करता है, वह शेष से क्या करेगा? वह शेष के प्रति घृणा से भरा होगा। जो आदमी ‘किसी का ध्यान’ करता है, वह शेष के प्रति क्या करेगा? Read More : चेतना की वह अकेली अवस्था ध्यान है। about चेतना की वह अकेली अवस्था ध्यान है।

प्रत्येक ध्यान के शीघ्र बाद करुणावान रहो

करुणावान व्यक्ति सर्वाधिक धनी होता है, वह सृष्टि के शिखर पर विराजमान है। उसकी कोई परिधि नहीं, कोई सीमा नहीं। वह बस देता है और अपनी रास्ते चला जाता है। वह तुम्हारे धन्यवाद की भी प्रतीक्षा नहीं करता। वह अत्यंत प्रेम से अपनी उर्जा को बांटता है। इसी को मैं स्वास्थ्य्प्रद कहता हूं। Read More : प्रत्येक ध्यान के शीघ्र बाद करुणावान रहो about प्रत्येक ध्यान के शीघ्र बाद करुणावान रहो

चक्रमण सुमिरन एक वरदान है

चक्रमण सुमिरन एक वरदान है. इसे गौतम बुद्ध ने आविष्कृत किया था इसके मूल स्वरूप में. यह एक ऐसी विधि है जिसमे व्यायाम, प्राणायाम. भक्ति, स्मरण, ध्यान, ऊर्जा ग्रहण, आदि विधाओं का सुंदर समन्वय है. सद्गुरु त्रिविर की अपार करुणा से यह ओशो धारा साधकों के लिए उपलब्ध है. इसकी महत्ता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है की प्रत्येक समाधि में सद्गुरु स्वयं प्रत्येक साधक को इसके लिए प्रशिक्षित करते हैं. 
सद्गुरु का आग्रह है की यदि किसी दिन सुमिरन छूट जाए तो भी प्रयास होना चाहिए की चक्रमण न छूते.
एक दिन चक्रमण सुमिरन के छूटने से ७ दिन पीछे हो जाती है साधना.
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साक्षी को खोजना— ओशो

साक्षी को खोजना— ओशो

शिव ने कहा: होश को दोनों भौहों के मध्‍य में लाओ और मन को विचार के समक्ष आने दो।देह को पैर से सिर तक प्राण तत्‍व से भर जाने दो, ओर वहां वह प्रकाश की भांति बरस जाए।

वह विधि पाइथागोरस को दी गई थी। पाइथागोरस वह विधि लेकर ग्रीस गया। और वास्‍तव में यह पश्‍चिम में सारे रहस्‍यवाद का उद्गम बन गया। स्‍त्रोत बन गया। वह पश्‍चिम में पूरे रहस्‍यवाद का जनक है।

यह विधि बहुत गहन पद्धतियों में से है। इसे समझने का प्रयास करो: “होश को दोनों भौहों के मध्‍य में लाओ।” Read More : साक्षी को खोजना— ओशो about साक्षी को खोजना— ओशो

क्या जीवन को सीधा देखना संभव नहीं है?

क्या जीवन को सीधा देखना संभव नहीं है?

शिक्षाशास्त्र से भी मेरी दृष्टि भिन्न और विरोधी हो सकती है। मैं न तो शिक्षाशास्त्री ही हूं और न समाजशास्त्री ही। किंतु यह सौभाग्य की बात है। क्योंकि जो जितना अधिक शास्त्र को जानते हैं, उनके लिए जीवन को जानना उतना ही कठिन हो जाता है। शास्त्र सदा ही सत्य के जानने में बाधा बन जाते हैं। शास्त्र से भरे हुए चित्त में चिंतन समाप्त हो जाता है। चिंतन के लिए तो निर्भार और पक्षपात मुक्त चित्त चाहिए न! Read More : क्या जीवन को सीधा देखना संभव नहीं है? about क्या जीवन को सीधा देखना संभव नहीं है?

कृत्रिम न होओ , स्वाभाविक रहो अपने ऊपर आदर्श मत ओढो़

कृत्रिम न होओ , स्वाभाविक रहो अपने ऊपर आदर्श मत ओढो़

सहज-योग का अर्थ होता है — कृत्रिम न होओ , स्वाभाविक रहो अपने ऊपर आदर्श मत ओढो़ , आदर्श पाखंड लाते हैं ।

आदर्शों के कारण विकृति पैदा होती है ,क्योंकि कुछ तुम होते हो , कुछ तुम होने की चेष्टा करते हो , तनाव पैदा हो जाता है ।

फिर तुम जो हो वह दब जाता है , उसमें जो तुम होना चाहते हो ।

इसी का नाम पाखंड है ।
सरहपा कहता है ; तुम जैसे हो वैसे ही जीयो ।

जरा सोचो , जरा इस पर ध्यान करो ।

तुम जैसे हो वैसे ही जीयो , जो परिणाम हो । धोखा न दो । Read More : कृत्रिम न होओ , स्वाभाविक रहो अपने ऊपर आदर्श मत ओढो़ about कृत्रिम न होओ , स्वाभाविक रहो अपने ऊपर आदर्श मत ओढो़

शांत प्रयोग सफल नहीं होता

शांत प्रयोग सफल नहीं होता

शांत प्रयोग सफल नहीं होता। क्योंकि आप भीतर इतने अशांत है कि जब आप आँख बंद करके बैठते हैं तो सिवाय अशांति के भीतर और कुछ भी नहीं होता। वह जो भीतर

अशांति है, वह चक्कर जोर से मारने लगती है। जब आप शांत होकर बैठते हैं, तब आपको सिवाय भीतर के उपद्रव के और कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता।इसलिए, उचित तो यह है कि वह जो भीतर का उपद्रव है, उसे भी बाहर निकल जाने दें। हिम्मत से उसको भी बह जाने दें। उसके बह जाने पर, जैसे तूफान के बाद एक शांति आ जाती है, वैसी शांति आपको अनुभव होगी। तूफान तो धीरे-धीरे विलीन हो जाएगा और शांति स्थिर हो जाएगी। Read More : शांत प्रयोग सफल नहीं होता about शांत प्रयोग सफल नहीं होता

ओशो – ध्यान धन है ।

ओशो – ध्यान धन है ।

संसार में लोग गंवाकर जाते हैं, कमाकर नहीं। 

अक्सर लेकिन हम समझते हैं कि लोग कमा रहे हैं। 

बाजारों में लोग कमाने में लगे हैं। 
पूछो तो जरा गौर से! क्या कमाकर ले जाओगे? 

क्या कमा रहे हो? गंवाकर जाओगे। 

एक संपदा थी भीतर, जिसको लुटाकर जाआगे। 

आत्मा बेच दोगे, ठीकरे खरीद लोगे। 
जीवन का परम अवसर जो 

परमात्मा का मिलन बन सकता था, 

उसमें कुछ कागज के नोट इकट्ठे कर लोगे।
और नोट यहीं पड़े रह जाएंगे। 

उन्हें तुम साथ न ले जा सकोगे। 

उन्हें कोई कभी साथ नहीं ले जा सका है। 

संसार की कोई भी वस्तु साथ नहीं जा सकती।  Read More : ओशो – ध्यान धन है । about ओशो – ध्यान धन है ।

साप्ताहिक ध्यान : संयम साधना

संयम साधना

कृष्ण ने दो निष्ठाओं की बात कही है। एक वे, जो इंद्रियों का संयम कर लेते हैं। जो इंद्रियों को विषय की तरफ--विषयों की तरफ इंद्रियों की जो यात्रा है, उसे विदा कर देते हैं; यात्रा ही समाप्त कर देते हैं। जिनकी इंद्रियां विषयों की तरफ दौड़ती ही नहीं हैं। संयम का अर्थ समझेंगे, तो खयाल में आए। दूसरे वे, जो विषयों को भोगते रहते हैं, फिर भी लिप्त नहीं होते। ये दोनों भी यज्ञ में ही रत हैं।

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साप्ताहिक ध्यान "मैं यह नहीं हूं'

मैं यह नहीं हूं'

मन कचरा है! ऐसा नहीं है कि आपके पास कचरा है और दूसरे के पास नहीं है। मन ही कचरा है। और अगर आप कचरा बाहर भी फेंकते रहें, तो जितना चाहे फेंकते रह सकते हैं, लेकिन यह कभी खतम होने वाला नहीं है। यह खुद ही बढ़ने वाला कचरा है। यह मुर्दा नहीं है, यह सकि"य है। यह बढ़ता रहता है और इसका अपना जीवन है, तो अगर हम इसे काटें तो इसमें नई पत्तियां अंकुरित होने लगती हैं।

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Dr. Popat Sonawane - Orthopaedic Surgeon, ghodnadi-shirur

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